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Thursday, August 6, 2026

जोधपुर राजगंगा गुरु का दावा: सूकर क्षेत्र ही है वास्तविक मोक्षभूमि, हरिद्वार में अस्थि विसर्जन की परंपरा पर उठाए गंभीर सवाल

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कासगंज। उत्तर प्रदेश के कासगंज जनपद के सूकर क्षेत्र से जुड़े एक धार्मिक दावे ने नई बहस को जन्म दे दिया है। थाना सोरों शूकर क्षेत्र निवासी अंकित बरवारीया (ठाकरा) ने दावा किया है कि वर्तमान समय में हरिद्वार को अस्थि विसर्जन का प्रमुख स्थान मानने की परंपरा ऐतिहासिक और धार्मिक तथ्यों के अनुरूप नहीं है। उनका कहना है कि प्राचीन ग्रंथों और राजवंशीय ख्यातों में वर्णित वास्तविक मोक्षस्थली सूकर क्षेत्र है, जहां आज भी अस्थि विसर्जन और पिंडदान की परंपरा चली आ रही है।

अंकित बरवारीया (ठाकरा) का दावा है कि आज देशभर से लोग अस्थि कलश लेकर हरिद्वार पहुंचते हैं, जबकि जिस स्थान को लोग गंगा घाट समझते हैं, वह वास्तव में एक नहर है, जिसका निर्माण बाद के समय में हुआ। उनका कहना है कि प्राचीन काल में गंगा की मुख्य धारा कनखल क्षेत्र से होकर बहती थी, जहां माता सती के आत्मदाह से जुड़ी मान्यताएं प्रचलित हैं। उनके अनुसार, वर्तमान हरिद्वार में होने वाले अस्थि विसर्जन की परंपरा पर ऐतिहासिक दृष्टि से पुनर्विचार किए जाने की आवश्यकता है।
१ प्रक्षिप्तास्थि वर्गस्तु रेणुरूपः प्रजायते। त्रिदिनान्ते वराहरोहे मम क्षेत्र प्रभावतः ।।

२ षष्टिवर्ष सहस्त्राणि योडन्यत् कुरुते तपः। तत्फलं लभते देवि प्रहरार्धेन सूकरे ।।

भावार्थः-

1. है पृथ्वी मेरे इस कुण्ड में डाली गयी अस्थीयां तीन दिन में वालू रूप हो जाती हैं और प्राणी मेरे धाम में निवास करता है।

2. है देवी जो फल अन्य तीर्थो में साठ हजार वर्ष तप करने से प्राप्त होता है वो फल मेरे सूकरक्षेत्र सोरों में आधे प्रहर में प्राप्त हो जाता है।

उन्होंने यह भी कहा कि सूकर क्षेत्र को भगवान श्रीहरि विष्णु के तृतीय अवतार भगवान वराह की मोक्षभूमि माना गया है। उनका दावा है कि विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और पुराणों में इस क्षेत्र का विशेष महत्व बताया गया है। उनके अनुसार, सूकर क्षेत्र में अस्थि विसर्जन करने से मिलने वाले धार्मिक फल का उल्लेख भी प्राचीन ग्रंथों में मिलता है और यही कारण है कि यह स्थान सनातन परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।

अंकित बरवारीया (ठाकरा) ने कुछ प्राचीन संस्कृत श्लोकों और राजवंशीय विवरणों का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति अन्य तीर्थों में हजारों वर्षों तक तप करे, तब भी जो पुण्य प्राप्त होता है, वह सूकर क्षेत्र में अल्प समय के धार्मिक अनुष्ठान से प्राप्त होने की मान्यता है। हालांकि, इन श्लोकों और दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है तथा विभिन्न धार्मिक परंपराओं में इस विषय पर अलग-अलग मत प्रचलित हैं।

धार्मिक विषय से जुड़े इन दावों के सामने आने के बाद क्षेत्र में चर्चा तेज हो गई है। धर्माचार्यों और इतिहासकारों का मानना है कि ऐसे विषयों पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले प्राचीन ग्रंथों, ऐतिहासिक अभिलेखों और प्रमाणिक स्रोतों का गहन अध्ययन आवश्यक है। समाचार लिखे जाने तक संबंधित धार्मिक संस्थाओं या प्रशासन की ओर से इस विषय पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी।

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