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Monday, March 23, 2026

अलीगढ़ में एक ही परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़,बेटे की मौत के बाद तहरीर की प्रति के लिए भटक रहा पिता

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अलीगढ़ से एक बेहद दर्दनाक और संवेदनशील मामला सामने आया है, जहां एक ही परिवार ने कुछ ही महीनों में कई अपनों को खो दिया। लगातार हुए इन हादसों के बाद मानसिक रूप से टूट चुके पिता अब अपने इकलौते बेटे की मौत से जुड़ी तहरीर की प्रति के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं। मामला थाना जवां क्षेत्र के ग्राम चंदौखा का है। यहां के निवासी वीरेन्द्र कुमार ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को प्रार्थना पत्र देकर अपनी पीड़ा जाहिर की है। उन्होंने बताया कि उनके परिवार पर एक के बाद एक दुखों का ऐसा पहाड़ टूटा कि वे पूरी तरह से टूट गए। प्रार्थी के अनुसार, सबसे पहले 10 जुलाई 2025 को उनके बहनोई का निधन हुआ। इसके बाद 21 जुलाई 2025 को उनके छोटे भाई की मृत्यु हो गई। परिवार इस सदमे से उबर भी नहीं पाया था कि 20 अगस्त 2025 को उनकी पत्नी ने भी दम तोड़ दिया। इन घटनाओं से परिवार पूरी तरह बिखर चुका था, लेकिन सबसे बड़ा झटका 19 अक्टूबर 2025 को लगा, जब उनके इकलौते बेटे की भी मृत्यु हो गई। वीरेन्द्र कुमार का कहना है कि बेटे की मौत के समय वे मानसिक रूप से इतने परेशान थे कि उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था। इसी दौरान थाने से आए एक व्यक्ति ने उनसे तहरीर

 

लिखवाई और उसे थाने में जमा करा दिया। लेकिन उस तहरीर की कोई प्रति उन्हें नहीं दी गई। जब कुछ समय बाद उन्होंने तहरीर की छाया प्रति लेने की कोशिश की, तो उन्हें बताया गया कि मामला कोर्ट में भेज दिया गया है। प्रार्थी ने 26 नवंबर 2025 को थाना जाकर जानकारी लेने की कोशिश की, लेकिन कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। इसके बाद उन्होंने 28 नवंबर 2025 को रजिस्ट्री के माध्यम से थाना अध्यक्ष को पत्र भी भेजा, लेकिन उसका भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। इतना ही नहीं, 4 दिसंबर 2025 को दोबारा थाना जाने पर भी उन्हें तहरीर की प्रति उपलब्ध नहीं कराई गई। अब वे यह भी नहीं जान पा रहे हैं कि उनकी शिकायत किस न्यायालय में भेजी गई है, जिससे वे वहां जाकर उसकी प्रति प्राप्त कर सकें। पीड़ित पिता ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से गुहार लगाई है कि उन्हें यह जानकारी उपलब्ध कराई जाए कि उनकी तहरीर किस कोर्ट में भेजी गई है, ताकि वे उसकी छाया प्रति प्राप्त कर सकें और आगे की कार्रवाई कर सकें। इस पूरे मामले ने प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर जहां एक व्यक्ति अपने परिवार के चार सदस्यों को खोकर पहले ही गहरे सदमे में है, वहीं दूसरी ओर उसे न्यायिक प्रक्रिया की बुनियादी जानकारी और दस्तावेज पाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन इस मामले को कितनी गंभीरता से लेता है और पीड़ित को कब तक राहत मिलती है।

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