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Wednesday, May 27, 2026

“शादी बराबरी की साझेदारी, सर्विस कॉन्ट्रैक्ट नहीं”, बॉम्बे हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- पत्नियां ‘नौकरानी’ नहीं

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बॉम्बे हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि पत्नी द्वारा घर का काम न कर पाना या उससे इंकार करना क्रूरता के दायरे में नहीं आता। कोर्ट ने पत्नी को हर महीने ₹20,000 भरण-पोषण भत्ता देने का भी निर्देश दिया।बॉम्बे हाई कोर्ट ने वैवाहिक अधिकारों और लैंगिक समानता को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पत्नी द्वारा घर का काम (जैसे- खाना बनाना और साफ-सफाई) न कर पाना या उससे इंकार करना क्रूरता नहीं है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि “शादी बराबरी की साझेदारी है, ना कि कोई सर्विस कॉन्ट्रैक्ट।”

न्यायमूर्ति भारती डांगरे और मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने पारिवारिक अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें एक चार्टर्ड अकाउंटेंट (CA) पति को क्रूरता के आधार पर तलाक की मंजूरी दी गई थी। इसके साथ ही, हाई कोर्ट ने पति को अपनी अलग रह रही पत्नी को हर महीने ₹20,000 भरण-पोषण भत्ता देने का भी निर्देश दिया है।

पत्नियों को ‘नौकरानी’ नहीं समझा जा सकता: HC
हाई कोर्ट ने पति की उस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें उसने कहा था कि पत्नी द्वारा खाना न बनाना, सफाई न करना या उसके माता-पिता की बात न मानना मानसिक क्रूरता है। खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा, “खाना बनाने या साफ-सफाई जैसे घरेलू काम करने में महज विफलता को अपने आप क्रूरता नहीं माना जा सकता। शादी दो लोगों के बीच बराबरी की साझेदारी है, कोई सर्विस कॉन्ट्रैक्ट नहीं है और पत्नियों को ‘नौकरानी’ नहीं समझा जा सकता।”

अदालत ने आगे कहा कि फैमिली कोर्ट का यह निष्कर्ष बिल्कुल भी उचित नहीं था कि पति अपनी पत्नी के खिलाफ क्रूरता के आरोपों को साबित करने में सफल रहा।

शुरू से विवादों में रही ये शादी
इस जोड़े की शादी 28 फरवरी 2002 को हुई थी, लेकिन शादी के कुछ ही दिनों के भीतर दोनों के बीच विवाद शुरू हो गए। हालांकि, जून 2002 में मध्यस्थता के जरिए मामला कुछ समय के लिए सुलझ गया और दोनों ने नई शुरुआत करने का फैसला किया, लेकिन यह समझौता ज्यादा दिन नहीं चला। 7 जुलाई 2002 को पत्नी अपने ससुराल से अलग होकर माता-पिता के घर रहने चली गई।

इसके बाद, साल 2004 में पति ने मुंबई की फैमिली कोर्ट में क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका दायर की, जबकि पत्नी ने भरण-पोषण भत्ते के लिए गुहार लगाई। साल 2010 में फैमिली कोर्ट ने पति को तलाक दे दिया और पत्नी की गुजारा भत्ता याचिका खारिज कर दी। इस फैसले के खिलाफ पत्नी ने हाई कोर्ट का रुख किया था।

दोनों पक्षों के आरोप-प्रत्यारोप
पति का आरोप था कि उसकी पत्नी का व्यवहार बेहद रूखा था, वह घर का काम नहीं करती थी, सास-ससुर की बात नहीं मानती थी और उसे खाना बनाना भी नहीं आता था। पति ने यह भी दावा किया कि पत्नी उसे आत्महत्या की धमकी देती थी और तलाक की याचिका के बदले में पुलिस व अन्य अधिकारियों से शिकायत कर उसे मानसिक तनाव देती थी।

दूसरी ओर, पत्नी ने सभी आरोपों को खारिज करते हुए पति और उसके परिवार पर दहेज उत्पीड़न का आरोप लगाया। उसने कहा कि शादी में उसके माता-पिता द्वारा काफी खर्च किए जाने के बावजूद, ससुराल वाले लगातार महंगे गहनों और नकदी की मांग करते थे। उसे छोटी-छोटी बातों पर प्रताड़ित, अपमानित और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता था, जिसके कारण मजबूरन उसे घर छोड़ना पड़ा और शिकायतें दर्ज करानी पड़ीं।

“क्षमता से तय होगा गुजारा भत्ता”
मामले की सुनवाई के दौरान पति ने पत्नी को स्थायी गुजारा भत्ता देने का विरोध किया था। उसका तर्क था कि पत्नी आर्थिक रूप से स्वतंत्र है और वह ब्राइडल साड़ी डेकोरेशन, पेंटिंग, ड्राइंग और आर्ट क्लासेस चलाकर अपनी आजीविका कमाती है। हालांकि, हाई कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि पति की वित्तीय क्षमता का आकलन केवल उसके द्वारा टैक्स रिटर्न में घोषित आय के आधार पर नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि पति एक योग्य CA है, इसलिए उसके पास अच्छी-खासी कमाई करने की क्षमता है। अदालत को गुजारा भत्ता तय करते समय कुल परिस्थितियों, पेशेवर योग्यता और जीवन स्तर को ध्यान में रखना चाहिए। कोर्ट ने देश में बढ़ती महंगाई और जीवन यापन के खर्चों का भी जिक्र किया। अदालत ने कहा कि जो रकम साल 2005 या 2010 में अंतरिम चरण के दौरान उचित लगती थी, वह आज के आर्थिक परिदृश्य में एक गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकती।

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