पटना (बिहार)।
राजधानी पटना थाना मनेर गांव सुखचक से एक बेहद चिंताजनक और झकझोर देने वाला मामला सामने आया है, जहां टेंट–पंडाल व्यवसाय से जुड़े एक व्यक्ति पर कर्ज, धमकी और सामाजिक दबाव का ऐसा बोझ पड़ गया है कि उसका पूरा परिवार संकट में आ गया है। शिकायतकर्ता बबलू कुमार पंडित, निवासी राजधानी पटना थाना मनेर गांव सुखचक पिछले करीब 10 वर्षों से टेंट–पंडाल का काम कर रहे हैं। उन्होंने मीडिया को बताया कि मेहनत और भरोसे के बल पर उन्होंने अपना कारोबार खड़ा किया, लेकिन आज वही भरोसा उनके लिए सबसे बड़ी मुसीबत बन गया है।
बबलू कुमार का कहना है कि दोस्ती-यारी और कामकाज के सिलसिले में उन्होंने अलग-अलग लोगों के पास करीब 30 से 40 लाख रुपये का लेन-देन कर रखा है। कई लोग उनके पैसे लौटाने को तैयार नहीं हैं। आरोप है कि जब वह अपना बकाया मांगने जाते हैं तो कुछ लोग रास्ते में गाड़ी रुकवा लेते हैं, पैसे मांगने पर उल्टा धमकाते हैं और जान से मारने की धमकी तक दे देते हैं। पीड़ित का कहना है कि डर और दबाव के कारण वह कई बार चुप रह जाने को मजबूर हो जाते हैं।
पीड़ित ने बताया कि टेंट–पंडाल के काम में उन्होंने छोटे-छोटे अमाउंट भी उधार पर दिए थे—कहीं 22 हजार, कहीं 25 हजार, कहीं 20 हजार, 18 हजार या 16 हजार रुपये। लेकिन बड़ी संख्या में लोग पैसे नहीं लौटा रहे हैं। कुछ मामलों में जातिगत विवाद भी सामने आया है, जहां केवल जाति के आधार पर पैसे देने से इनकार कर दिया गया। इन सब कारणों से वह धीरे-धीरे कर्ज के दलदल में फंसते चले गए।
बबलू कुमार पंडित ने कहा कि लगातार आर्थिक दबाव और धमकियों के चलते उनका मानसिक संतुलन भी बिगड़ने लगा है। उनके परिवार में दो बेटे और दो बेटियां हैं, जिनकी पढ़ाई, पालन-पोषण और भविष्य को लेकर वह हर दिन चिंता में रहते हैं। उन्होंने बताया कि कर्ज बढ़ने की वजह से अब उनका टेंट–पंडाल का काम भी लगभग ठप हो गया है और नए काम लेने की स्थिति में नहीं हैं।
पीड़ित ने प्रशासन और सरकार से भावुक अपील करते हुए कहा कि उनकी आवाज योगी और मोदी सरकार तक पहुंचे। वह चाहते हैं कि सरकार या प्रशासन की ओर से उन्हें किसी तरह का लोन, सब्सिडी या आर्थिक सहायता दी जाए, ताकि वह पुराने कर्ज को चुका सकें और दोबारा अपना काम शुरू कर सकें। उनका कहना है कि अगर समय रहते मदद नहीं मिली, तो उनका परिवार पूरी तरह बर्बाद हो सकता है।
यह मामला न सिर्फ एक छोटे व्यवसायी की आर्थिक बदहाली की कहानी है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोग लेन-देन, सामाजिक दबाव और धमकियों के बीच पिस जाते हैं। अब देखना यह है कि प्रशासन इस पीड़ा को कितनी गंभीरता से लेता है और क्या एक कर्ज में डूबे परिवार को राहत मिल पाती है या नहीं।
