बिहार के भोजपुर जिले की रहने वाली रिया कुमारी पासवान की जीवन कहानी संघर्ष, गरीबी, सामाजिक कुरीतियों और विपरीत परिस्थितियों के बीच शिक्षा के लिए लगातार किए गए संघर्ष की मिसाल बनकर सामने आई है। बचपन से आर्थिक तंगी का सामना करने वाली रिया ने परिवार पर टूटते दुखों के बावजूद पढ़ाई का दामन नहीं छोड़ा। उनकी कहानी बताती है कि कैसे गरीबी, दहेज प्रथा, बाल विवाह, पारिवारिक त्रासदी और सरकारी प्रक्रियाओं की जटिलताओं के बीच भी उन्होंने अपने सपनों को जिंदा रखा।
रिया के अनुसार उनका जन्म बिहार के भोजपुर जिले के चौरी गांव में एक गरीब किसान परिवार में हुआ। परिवार में चार बहनें और तीन भाई थे। आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि ट्यूशन पढ़ना भी संभव नहीं था। जब गांव के अन्य बच्चे ट्यूशन जाते थे तो उनका भी मन करता था, लेकिन माता पिता के पास फीस भरने के लिए पैसे नहीं थे।
उन्होंने बताया कि बड़ी बहन ने आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की थी, जिसके बाद गांव के लोग परिवार पर शादी करने का दबाव बनाने लगे। रिश्तेदारों की सलाह पर एक युवक से विवाह तय कर दिया गया। आरोप है कि लड़के के बारे में यह जानकारी छिपाई गई कि वह नशे का आदी और गलत गतिविधियों में शामिल था। तिलक में तीस हजार रुपये और सोने की अंगूठी की मांग भी की गई, जिसे पूरा करने के लिए पिता को कर्ज लेना पड़ा।
शादी के दौरान उस समय बड़ा विवाद खड़ा हो गया जब पता चला कि दूल्हा पढ़ा लिखा नहीं है। रिया के अनुसार उनकी मां ने इसका विरोध किया और शादी से इनकार कर दिया। विरोध करने पर उन्हें लोगों की नाराजगी और पति की मारपीट तक झेलनी पड़ी। हालांकि बाद में विवाह नहीं हो सका।
कुछ समय बाद परिवार पर एक और बड़ा दुख टूट पड़ा। बड़ी बहन गर्भवती हुईं, लेकिन आर्थिक तंगी और समय पर बेहतर इलाज नहीं मिलने के कारण उनकी मृत्यु हो गई। बहन की मौत से पूरा परिवार टूट गया। रिया भी गहरे सदमे में चली गईं और पढ़ाई छोड़ने का मन बना लिया।
उन्होंने बताया कि परीक्षा से कुछ महीने पहले उनके शिक्षकों ने उनका हौसला बढ़ाया और लगातार प्रेरित किया। सीमित संसाधनों के बीच उन्होंने उधार की किताबों और कठिन परिस्थितियों में पढ़ाई जारी रखी। आखिरकार उन्होंने मैट्रिक परीक्षा द्वितीय श्रेणी से उत्तीर्ण कर ली, जबकि उनके साथ परीक्षा देने वाले उनके दोनों चाचा असफल हो गए।
मैट्रिक के बाद भी संघर्ष खत्म नहीं हुआ। छात्रवृत्ति और जाति प्रमाण पत्र से जुड़ी समस्याओं के कारण उन्हें आगे की पढ़ाई में कई दिक्कतों का सामना करना पड़ा। आर्थिक तंगी के कारण मोबाइल फोन और अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं थीं, जिससे पढ़ाई प्रभावित होती रही।
इसी दौरान एक और बड़ा हादसा हुआ। सड़क किनारे बैठे उनके पिता को एक वाहन ने टक्कर मार दी। गंभीर रूप से घायल पिता के सिर और सीने में चोट आई। डॉक्टरों ने लंबे समय तक आराम की सलाह दी। इसके बाद परिवार की जिम्मेदारी मां और रिया के कंधों पर आ गई। दिन में घर का काम और रात में पढ़ाई उनकी दिनचर्या बन गई।
रिया का कहना है कि उनके जीवन में कुछ शिक्षकों ने अभिभावक की तरह साथ दिया। उन्होंने पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रेरित किया और सरकारी दस्तावेजों से जुड़ी समस्याओं के समाधान में भी मदद करने का भरोसा दिया। इसी सहारे उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी शिक्षा जारी रखने का संकल्प नहीं छोड़ा।
रिया की यह कहानी केवल एक छात्रा के संघर्ष की दास्तान नहीं है, बल्कि यह उन हजारों बेटियों की हकीकत भी बयां करती है जो गरीबी, सामाजिक दबाव और पारिवारिक संकटों के बावजूद अपने सपनों को पूरा करने के लिए लगातार संघर्ष कर रही हैं। हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में लगाए गए आरोप और दावे रिया कुमारी पासवान के कथन पर आधारित हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
